सोमवार, 28 दिसंबर 2015

वह अभी भी जिंदा है

वह  आदमी  अभी  मरा नहीं है
जिसे हम  आज जला कर  लौटे हैं
अपने दोस्तों के साथ
डाक्टर  ने भले ही उसे मृत घोषित  कर दिया है
अस्पताल वालों ने एक प्रमाण पत्र  भी  जारी कर दिया है
उसके मरने का 
लेकिन  वो आदमी मरा नहीं है

घर आकर  जब खाना  खाना बैठा हूँ
कि वो चला आया है
 ज़िंदा होकर मेरे सामने
दरवाजा खोलकर  वे सीधे आया है मेरे कमरे में 
मुझे यकीन नहीं हो रहा है
क्या ये वही आदमी  है
 जिसे जलाया हमने चन्दन और घी में




वो आदमी मरा नहीं है
उसने मुझसे कहा कि वो फिर आयेगा
 मेरे  फ़ोन भी करेगा  मुझे
और जहाँ ज़ुल्म होगा
जहाँ अन्याय के विरुद्ध कोई  करेगा आवाज़  बुलंद
तो वो   चला आएगा
 जहाँ लड़ना होगा
तो वह झुकेगा नहीं

मुझे अभी भी लगता है
वो  आदमी मरा नहीं है
वो अब  हमारे सपनो में रोज आने लगा है
वो हर दरवाजा खटखटाने लगा   है
वो अँधेरे में एक चराग जलाने  लगा है 
फिर कैसे कह दूँ
कि वो आदमी मर गया है
जबकि चिता पर उसे धू धू  कर जलते देखा है मैंने

इसलिए मुझे लगता है
कि वो आदमी मरा नहीं है
उसकी पत्नी को फूट फूट कर रोते देखा है
उसके बच्चों को बिलखते देखा  है

उसकी  अस्थियों को गंगा नदी में प्रवाहित करने कल जा रहा हूँ  हरद्वार
उसकी शोक सभा  में आये हैं कई लोग
थोड़ी देर में वो आदमी भी आ गया है
जिसे हम जला कर आये हैं

वो आदमी जिंदा है अभी भी 
लेकिन दुनिया उसे मरा हुआ समझती है
इस संसार में कुछ लोग ऐसे जीते हैं
कि लगता है वे न जाने कब के मर चुके हैं 

लेकिन  कुछ लोग ऐसे मरते हैं
कि लगता है कि वे ज़िंदा हैं  
इसलिए अभी भी मुझे नहीं लगता
कि वो आदमी मर गया है
जो ऐसे शखस  से प्यार करता रहा
जिसे मैं भी आज भी बेहद प्यार करता हूँ चुपचाप
और ये बात  उसेता ज़िन्दगी मालूम भी न थी   


गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

कुछ भी भेज दो

ये तस्वीर भेज दो जिसमे तुम बैठी हो एक चट्टान के पास
अगर नहीं भेज सकती हो तो
अपनी छाया ही भेज दो
जो मिल गयी आज शाम के साथ
अगर तुम नहीं भेज सकती हो अपनी छाया
तो अपने क़दमों ही आहट ही भेज दो
तुम यह भी कह सकती हो
कि मैं अपनी आहट को कैसे भेजूं
फिर तुम अपनी नींद का एक टुकडा ही भेज दो
मेरे पास किसी लिफाफे में बंद करके
अगर ये भी भेजना हो तुम्हारे लिए मुश्किल
तो तुम अपने स्वप्न ही भेज दो मेरे पास
लेकिन तुम्हे डर लगेगा
कि कहीं ये टूट न जाएँ भेजने पर
कोई बात नहीं
तुम अपनी कुछ स्मृतियाँ ही भेज दो
ताकि मुझे दिलासा हो
कि कोई एक चीज़ है तुम्हारी दी हुई मेरे पास
अगर तुम्हे इन्हें भेजने में हो रही हो दिक्कत
तो बताना
मैं तुमसे कुछ भी नहीं कहूँगा भेजने को
मैं तो सिर्फ तुम्हे पुकारना चाहता हूँ
घाटियों में कि उसकी आवाज़ गूंजती रहे मेरे कानो में
इन्ही आवाजों के सहारे ही तो जी सका हूँ
अब तक यह ज़िन्दगी
मुझे मालूम है
तुम इतनी दूर हो
कि मेरी आवाज़ भी तुम्हे सुनायी नहीं देंगी
तुम खुद भी ज़िन्दगी की जद्दो जहद में फंसी हो
मैं भी तुम्हे इतनी दूर से वो सब कुछ देना चाहता हूँ
जो पास रहकर भी तुम्हे नहीं दे सका
और अगर दिया भी होगा
तो तुमने नहीं पहचाना होगा
वही था मेरा प्यार
आसमान पर टिमटिमाता हुआ
सुदूर एक तारे की तरह
जो ठीक ठीक दिखाई नहीं देता
नंगी आँखों से 

मेक इन इंडिया

बहुत खोज रहा हूँ
मैं भारत को
वो दिखाई नहीं देता अब जल्दी
अब चारों तरफ
इंडिया ही इण्डिया है
मेक इन इंडिया की गुफा से निकला ही था
कि सामने दिखाई पडी डिजिटल इंडिया की सुरंग
वहां से बाहर निकला
तो सामने था
चमचमाता हूँ थिंक इंडिया
पीछे गर्दन घुमाई
तो स्किल इंडिया मुस्करा रहा था
सामने गंदे नाले में
खिलखिला रहा था
क्लीन इंडिया
ठंढ में दुबका
बैठा झुगी में जो था 
उसे उजाड़ रहा था बुलडोजर
वही मेरा भारत था 

नकाब पोश

वे सभी नकाबपोश थे
पर खुद को पाक साफ़ बताते थे
वे लगभग हर दिन
एक दूसरे पर आरोप भी लगाते थे
वे हवामें जांच रिपोर्ट भीलहराते थे
पर पूरी बात नहीं बतातेथे
कुछ बातें अपनी सुविधा के लिए छिपातेथे
फिर उसमे झूठ भी मिलाते थ
वे एक दूसरे के मुखौटे उतारने में लगे थे
वे अलग नस्ल के लोग थे
उनकी प्रजाति ही अलग थी
उनकी भाषा का पतन होचूका था
उनसबके चेहरे पर कोई न कोई दाग थे
उनके हाथ खून से सने थे
उन्हें जेल में होना चाहिए था
पर नके नामपर हवायी अड्डे रखे जा रहे थे
अबतो मूर्तियाँ भी लगाई जारहीथी
डाकटिकट भी जारी हो रहेथे
वे सभी नकाब पोश थे
थे वे भीतर से भेडिये
पर कहते खुद को खरगोश थे .
वे सभी नकाब पोश थे
सत्ता के नशे में मदहोश थे

अगर मेरे पास शरीर नही होता

अगर मेरे पास शरीर नहीं होता
नहीं होतीं मेरी कोई आदिम इच्छाएं
तो क्या तब भी
तुम मुझसे प्यार करते
अगर मेरी आँखें नहीं होती
तो क्या तुम ये कहते
तेरी आँखों के सिवाय
दुनिया में रखा क्या है
अगर मैं हवा होती
तो बाहों में भरते मुझे कैसे
अगर मैं नदी होती
तो फिरमेरे होटों को कैसे चूमते
अच्छा ये बताओ
तुमने मुझे नदी या तितली या फूल क्यों कहा
क्यों तुमने मेरे बालों की तुलना घटाओं से की
क्यों तुमने कहा
कि मेरे बदन से एक खुशबू आती है
आखिर तुमने मुझे चाँद का टुकडा क्यों कहा
सच बताओ
अगर नहीं होता मेरे पास कोई शरीर
तो फिर तुम मेरी आत्मासे कैसे प्यार करते
क्योंकि हरआत्मा शरीर मेंरहती है
उससेनिकल कर
तोवोह सिर्फ भटकती है
तुम्हारी
भाषा की चालाकियां
खोल देती है
तुम्हारे प्रेम का रहस्य
तुम्हारे इरादे छिपे हैं
तुम्हारे प्रतीकों में
मुझे हम बिस्तर करने से पहले सोच लो
तुम चाहते क्या हो
इसज़िन्दगी से

भेड़िए की शक्ल में

जब घूम रहे हैं भेडिये
प्रेमियों की शक्ल में
तो मैं किस किस को करूँ प्यार
जब मंडरा रहे हों गिद्ध 
चारों तरफ
जिस्म को नोचने पर उतारू
तो बोलो तुम पर कैसे करूँ विश्वास
जब शराब के नशे में
बचपन का दोस्त
हो जाये अचानक बलात्कारी
तो कैसे लगाऊं
उसके अच्छे होने का कयास
जब धोका दे हर पल
मेरा ही जीवन साथी
तो उसके साथ कैसे पूरी करूँ
मैं अपनी नींद
कैसे देखूं मिलकर कोई ख्वाब
मैं इतने दुःख में कभी नहीं थी
नहीं थी इतने गहरे संकट में
कि ज़िन्दगी मुझे अकेली ही जीनी पड़े
और रह जाऊं
मैं अतृप्त
मर जाएँ मेरी इच्छाएं
मेरे भीतर
नहीं कर पाऊं
किसीको प्यार
मरने के बाद
क्या तुम दोगे मुझे
मुझे फिर से  यह जीवन 
Vimal Kumar

स्वीकार

कुछ दाग मेरे ऊपर भी है
अब मरने से पहले
स्वीकार लेना चाहिए मुझे
लालच और नफरत
आग और धुआं
क्या क्या नहीं था
मेरे भीतर भी
जिन्दगी भर
एक भेडिये से लड़ता रहा
एक गीदड़ से झगड़ता रहा
अपन चेहरा बदलता रहा
शिकस्त होता रहा
कबूल कर लेना चाहिए अब
मुझे अपने सारे गुनाह
तुमसे विदा लेने से पहले
एक मुखौटा मैंने भी पहन रखा था
कब्र के भीतर सोते हुए
एक चश्मा लगा रखा था आँखों पर
अंधेरों को ढोते हुए
दफन होगया मैं जरूर
जो लिखा गया इतिहास
मेरा बारे में
वो सच नहीं था
कुछ दाग मेरे ऊपर थे
लेकिन अपने दाग मैं छिपाता रहा
दूसरों के दाग देखकर
रोज़ मैं  चिल्लाता  रहा 
Vimal Kumar
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जिंदा हूँ तुम्हारी आँखों मे

चला गया हूँ अब
तुम्हारे सामने से जरुर
परिदृश्य से गायब हो गया हूँ

तुम मुझे खोजोगे
तो किसी जलसे में भी नहीं मिलूँगा
नहीं दिखूंगा कहीं
किसी चीज़ की ओट में
न किसी किताब में
न किसी अखबार की तस्वीर में
न किसी रुपहले परदे पर बहस में
मैं तुम्हारे शहर में भी नहीं हूँ
नदी और समंदर और पर्वतों और जंगलों से भी बहुत दूर
दूर गुफाओं से
लेकिन मैं मर नहीं गया हूँ
एक कब्र में रहता जरुर हूँ
जलकर राख जरुर हो गया हूँ
जब तक आग है
धुआं हैं
बहता हुआ खून है
है सीने में जलन
कसमसाती रगें हैं
भिची हुई मुठियाँ है
मैं ज़िंदा हूँ
लेकिन तुम मुझे देख नहीं सकते हो
किसी शब्द में कर सकते हो महसूस
तुम मुझसे बिना किसे पते के मिल सकते हो
मैं मरा नहीं हूँ
ज़िंदा हूँ
तुम्हारी आँखों में
एक सपना बनकर
और सपने कभी दफन नहीं होते
वे नहीं रहते कभी किसी
कब्र में .
एक मुर्दे की तरह .

झूठ के विरुद्ध

झूठ के विरुद्ध
जैसे ही तुम सच बोलोगे
लोग तुम तुम्हे घेर लेंगे चारों तरफ से
एक चक्रव्यूह रच देंगे
पूछेंगे तरह तरह के सवाल
तुम्हे ही मुजरिम ठहराएंगे
बहुत मुश्किल है सच बोलना
झूठ हमेशा रहता है साथ
ताक़तवरों के
इसलिए जैसे ही तुम सच बोलोगे
मार दिए जाओगे
फेंक दिए जाओगे तुम
किसी झाडी में
किसी दिन सुबह सुबह मिलेगी
नाले में तुम्हारी लाश
तुम्हारे घर को
लगा दी जायेगी आग
रात में अचानक
तुम्हारी किताबभी नहीं छपेगी
तुम्हारा वजीफा भी किसी और को दे दिया जायेगा
तुम्हे वंचित किया जायेगा दफ्तर में
तुम्हारे ही अधिकारों से
नौकरी से भी बर्खास्त कर दिए जाओगे एक दिन
किसी झूठे मुकदमे में फंसा दिए जाओगे
इसलिए कोई नहीं चाहता
बोलना अपने समय में सच
लेकिन हर युग में बोलते हैं कुछ लोग सच
वे परवाह नहीं करते
डरते नहीं वे
नहीं होते वे गीदड़
अब तुम्हे करना है तय
कि तुमसच बोलकर आदमी बनना चाहते हो
या
झूठ बोलकर गीदड़ .

टिप्पणियाँ
Vimal Kumar

शनिवार, 12 दिसंबर 2015

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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

आयरा :  किसी को मेरे सपने देकर जाना जरुर---------------...

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किसी को मेरे सपने देकर जाना जरूर

 किसी को मेरे सपने देकर जाना जरुर

---------------------------------------
मैं जब इस दुनिया से जाऊँगा
तो लाखो करोड़ों  लोगों की तरह ही  जाऊंगा
घरवालों से यह कहकर जाऊंगा
जब जाना ही था एक दिन मुझे
तो फिर मातम मानाने से क्या फायदा

जाने से पहले
अपना बही खाता ठीक कर जाऊंगा
हिसाब किताब कर लूँ जरा
किसी का क़र्ज़ तो नहीं बाकी मुझ पर

जब मैं इस दुनिया से जाऊंगा
तो जितनी दुआएं लेकर जाऊंगा
उतनी बद् दुआएं भी होंगी मेरे  साथ

किसी की यादों के अपने साथ लेकर जाऊंगा
तो किसी की यादों में बसकर भी
कई अतृप्त इच्छाएं भी होंगी
लालच और वासना को भी साथ लेकर जाऊंगा
अगर बची है मेरे भीतर किसी के लिए नफरत
तो उसे भी लेकर जाऊँगा
ईर्ष्या  को भी अपने साथ ले लूँगा
कोई ऐसे चीज़ छोड़ कर नहीं जाऊंगा
कि तुम मुझे देते रहो बात बात में गाली

इस दुनिया से जाते हुए
फूलों की खुशबू
पेड़ों की छाया
और कुछ धूप और चांदनी भी साथ होगी मेरे साथ

अगर अस्पताल में मरा तो डाक्टर और नर्सों की यादें होंगी
घर में मरा  तो खिडकियों और दरवाज़ों की स्मृतियाँ भी होंगी
अगर रस्ते में मरा तो  सडकों धड़कने होंगी मेरी साथ
ट्रेन या वायुयान में  मरा
तो मुसाफिरों के चेहरे होंगे मेरे साथ
नदी में डूबकर मरा
तो पानी के स्पर्श को जीकर मरूँगा
जो भी हो
फर्क क्या पड़ता है
कि कैसे मरा

अगर मैं इस दुनिया से मरा
तो मरने से पहले
अपने दोस्तों को इत्तिला कर जाऊंगा जरुर
 अगर मुझे पता चला कि मैं मरने जा रहा हूँ
लेकिन कमबख्त मौत कभी बता कर क्यों नहीं आती

फिर भी मैं मरा बिना बताये
तो तुम मेरे सपनों को संभलकर रखना जरुर
और तुम भी इस दुनिया से जाने से पहले
 उसे किसी को देकर जाना जरुर .
ज़िन्दगी और कुछ नहीं
 सपनो का एक अनवरत सिलसिला ही तो है .





मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

आयरा : अगर तुमने किया होता मुझसे प्रेमतो बादल  जरुर आते ...

आयरा : अगर तुमने किया होता मुझसे प्रेम
तो बादल  जरुर आते ...
: अगर तुमने किया होता मुझसे प्रेम तो बादल  जरुर आते मेरे शहर में और बारिश जरुर हुई होती अब तक अगर तुमने लिखा होता मुझे एक भी पत्र तो नदी...

दे दो मुझे

दे  दो मुझे
वो सब कुछ
 जो बहुत जरूरी सामान है
 मेरे जीने के लिए
अगर वो काम लायक नहीं हो तुम्हारे लिए
हालाँकि यह कहते हुए मुझे
 लालच की  आती है गंध
 अपने ही भीतर
इस जीवन ने  मुझे कितना लालची बना दिया है

कल देखी  जब तुम्हारी तस्वीर हंसती हुई
तो यही इच्छा हुई
 कि तुम से मांग लूँ मैं
तुम्हारी  यह हंसी
रखूं इसे अपने पास
 एक रुमाल की तरह अपनी जेब में

दे दो मुझे
जो तुम्हारे लिए भले ही रद्दी की चीज़ बन गयी हो
इसी में मैं खोज लूँगा अपने लिए कोई खुशी
दे दो मुझे वह सब कुछ
 जो खरीदा नहीं जा सकता हो इस दुनिया में
जो हो इतना बेशकीमती
 कि उसका मूल्य नहीं लगाया जा सकता हो

दे दो मुझे
जो तुम्हारे कंधे पर एक बोझ की तरह हो
जो हो कमरे में अँधेरे की मानिंद .
जो शब्दों में
 किसी भाषा में
अमूर्त ही हो
जो नहीं हो जिस्मानी
जो रूहानी सा लगता हो

जब साँस लेने से  बच जाये थोड़ी सी  हवा
 तो मुझे देना कि मैं भी जी सकूँ

जब रोने के बाद भी बच जाएँ आंसू
जब रौशनी चली जाये आँखोंसे
तो अपनी आँखे दे देना
कि उसमे डाल सकूँ मैं अपनी आँखों की ज्योति

दे देना तुम
 जो तुम्हारे लिए हो एक तरह से   
तुम्हारी दी हुई हर चीज़ काम आयेगी मेरे लिए
तुम भले ही अपना  प्यार न दे सको मुझे

दे देना तुम अपने हांथों की मेहंदी के कुछ फूल
अगर तुम्हे अपनी खुशी देने में हो किसी तरह की कोई मुश्किल
अपनी थोड़ी उदासी ही दे देना
इसी के सहारे कट जायेगी
अब यह ज़िन्दगी
जिसे काटना कितनी तकलीफ्देह  हो गया है
इस वक़्त में .

देना इतना ही
कि अगर नहीं लौटा सका  मैं तुम्हे
 इस जीवन में अगर  
मरने के बाद जरुर लौटा संकू एक दिन

तुम्हारी दी हुई हर चीज़
अब क़र्ज़ है मेरे लिए
एक नया कर्ज़दार हूँ मैं तुम्हारा

ब्याज भी देने को तैयार हूँ
लेकिन तुमने कह दिया है मुझसे
तुम्हारे पास देने को नहीं है कुछ भी
तो फिर ले ही लो
जो मैं तुम्हे चाहता हूँ देना
बिना तुमसे मिले हुए कभी
इस जीवन में .

विमल कुमार 

रविवार, 6 दिसंबर 2015

अगर किया होता प्रेम

अगर तुमने किया होता मुझसे प्रेम
तो बादल  जरुर आते मेरे शहर में
और बारिश जरुर हुई होती अब तक

अगर तुमने लिखा होता मुझे एक भी पत्र
तो नदी जरुर मुस्कराई होती
उसने पूछा होता मेरा हाल

 अगर तुमने एक बार भी  किया होता टेलीफ़ोन
तो तारे जरुर आते मेरे छत  पर टिमटिमाते हुए
वहीं से उन्होंने हाथ हिलाया होता मुझे

अगर तुम मिली होती कभी फिर रास्ते में
तो पेड़ों में जरुर कुछ निकले होते नए पत्ते
डाल कुछ झुकी होती मुझसे हाथ मिलाने के लिए बेताब

अगर तुमने पकड़ा होता मेरा हाथ कभी
 अँधेरे में लेते हुए चुम्बन
तो अंगारे जरुर भड़के होते
कुछ रौशनी हुई होती चरागों में

लेकिन आज तक न बारिश हुई
न नदी ही मुस्कराई
न तारे ही आये
न पेड़ों में निकले पत्ते
न रौशनी हुई

जितनी उम्मीद से आया था इस दुनिया में
उतनी नाउम्मीदी लेकर जा रहा हूँ
अब

फिर भी एक उम्मीद है

एक स्वप्न है
भले ही कुछ सांस अभी दफन  है .
सीने में


अगर तुम रहती थोड़ी देर भी इसी सीने में
सीने को इस तरह चाकू से
मुझे रोज काटना नहीं पड़ता

दुःख को इस तरह बांटना नहीं पड़ता
जो है अब तक निरर्थक उसे छांटना नहीं पड़ता